Tuesday, 28 January 2014

बचपन का वो जमाना था

बचपन का वो जमाना था 

बचपन का वो जमाना था 
अनगिनित खुशियों  का खज़ाना था 
चाँद पे जाने का  अरमान था 
पर दिल माँ का दीवाना था 
न रस्मे थी न रिवाज़ थे 
न अपना था न कोई पराया था 
जो गोद हंस के ले लेता 
वो ही बड़ा सयाना था 
क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था  


न गर्मी थी न जाड़ा था 
हमें तो सिर्फ खेलने जाना था 
गम कि इक वजह न थी 
ख़ुशी का न कोई ठिकाना था 
नादान दिल भरा उसमें अपनापन 
ऐसा प्यारा होता था बचपन 
याद आता हैं वो हर एक छण
चिंता रहित था उसका हर कण 
क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था  

हर त्यौहार का उल्लास था 
खुद पे कितना विश्वास था 
दुख भी कितने अच्छे थे 
सिर्फ खिलोने टूटा करते थे 
उंच नीच का ज्ञान नहीं था 
मासूम आँखों को इतना ध्यान नहीं था 
सपने थे जितने बड़े 
क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था  

वो साथी से झगड़ना था 
अगले पल फिर लिपटना था 
न दिल में खलिश थी 
न कोई अहम था 
आइस पाईस थी बरफ पानी था 
कंप्यूटर का कहा जमाना था 
वो गर्मी की छुट्टियां थी 
कटी पतंग,वो काटे चिल्लाना था 
क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था  

मिटटी के लड्डू थे,
घर-घर बनाना था 
मिटटी में सने पाँव थे,
घर पर डाँट खाना था 
लेकिन कल फिर से वही पहुँच जाना था 

क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था 

छोटा सा बस्ता था 
टीचर की नक़ल उतारनी थी 
दोस्तों का याराना था 
मिलके हुड दंग मचाना था 
सर पर घर को उठाना था 
कभी सर पे हाथ रखवाना था  
क्यूँ हो गये हम इतने बड़े ?
बचपन का वो जमाना था

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